Wednesday, January 16, 2019

रसायन विद्या

रसायन  एक प्रयोगात्मक में विज्ञान है। यह विद्या विभिन्न खनिजों,  वृक्षों, कृषि, विविध धातु के निर्माण और उसमें परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से अावश्यक औषधियों के निर्माण में उपयोगी है।
रसायनशास्त्रियों में नालंदा विद्यापीठ के आचार्य नागार्जुन को भारतीय रसायनशास्त्र के आचार्य माना जाता है।
नागर्जुन के 'रसरत्नाकार' और 'स्वास्थ्यमंजरी' जैसी पुस्तके लिखी थी।
आचार्य नागार्जुन ने वनस्पति औषधि के साथ रसायन औषधि के उपयोग का परामर्श दिया था।
पारे की भस्म बनाकर औषधि के रूप में उपयोग का प्रयोग नागार्जुन ने शुरू किया था।
नालंदा विद्यापीठ में रसायन विद्या के अध्ययन और संशोधन के लिए अपनी अलग रसायनशाला थी।
रसायनशास्त्रो के ग्रंथों में मुखरस, उपरस, दस प्रकार के विष,विविध प्रकार के क्षारों और धातुओं की भस्म  का वर्णन है।
रसायन विद्या की पराकाष्ठा भगवान  बुद्ध की धातु शिल्प से दृष्टिगोचर होती है।
बिहार के सुल्तानगंज में भगवान बुद्ध की 71/ 2 फुट ऊंची और 1 टन वजन की ताम्र मूर्ति प्राप्त हुई है ।
नालंदा के  बुद्ध की 18 फुट ऊंची तामृमूर्ति प्राप्त हुई है।
7 टन वजन और 24 फुट ऊंचा सम्राट चंद्रगुप्त द्वितिय( विक्रमादित्य) द्वारा बनाया गया विजय स्तंभ अभी तक बरसात, धूप, छांव के उपरांत अभी तक काट(जंग)  नहीं लगा है। यह भारतीय रसायन विद्या का उत्तम नमूना है।
प्राचीन भारत के विज्ञान का ज्ञान विश्व में स्वीकार्य हुआ है। हमारी संस्कृति विशाल और   वैविध्यपूर्णहै। उसमें धर्म और विज्ञान, परंपरागत आदर्शो, व्यावहारिक ज्ञान और समाज का सुमेल  समन्वय हुआ है जो विश्व के अधिकांश देशों में कम है।

धातु विद्या

प्राचीन काल से भारत के लोग  धातुविद्या को अपने व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करते हैं। प्राचीन भारत में धातु विद्या के क्षेत्र में आद्वितीय सिद्धियाँ प्राप्त की थी। उदाहरण स्वरूप में सिंधु घाटी से प्राप्त धातु की नर्तकी की प्रतिमा, तक्षशिला से प्राप्त हुई।
  कुषाण राजाओं के समय की भगवान बुद्ध की प्रतिमाएंँ चोल राजाओं के समय तैयार हुई धातुशिल्प, चेन्नई  के संग्रहालय में रखी गई अंतरराष्ट्रीय प्राप्त नृत्य कला का उत्कृष्ट नमूना महादेव नटराज का शिल्प है।
एक अन्य शिल्प धनुर्धारी श्रीराम का शिल्प भी चेन्नई के संग्रहालय में रखा गया है।
इसके अलावा कलात्मक देवी देवता,  पशु-पक्षी तथा सुपारी काटने की सरौंतिया आदि बनाई जाती थी। ये सभी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इन धातुओं को बनाने की परंपरा 10वीं से 11वीं सदी में शुरू हुई थी।

अमीर खुशरो

अमीर खुसरो मध्यकाल का सबसे प्रसिद्ध साहित्यकार माना जाता है।
उसकी महत्वपूर्ण कृतियाँ आसिका, नूर, सिपिहर और किरातुल सदायन है। इसके उपरांत उसने अनेक काव्य ग्रंथों की रचना की थी। अमीर खुसरो अपने  ग्रंथों में भारत को पृथ्वी का स्वर्ग मानता था और अपने आपको भारतीय होने का गर्व मानता था।  उसने अपने ग्रंथों में भारत की सुंदरता, उसकी ईमारतें और उसके ज्ञान-विज्ञान का बखान किया था।  वह दृढ़ता से मानता था कि हिंदू धर्म का सारतत्व अनेक तरह से इस्लाम के साथ मिलता है। वह दिल्ली के आसपास बोली जानेवाली भाषा को हिंदीवी कहता था और उसे अपनी मातृभाषा कहता था। इस भाषा में उसने कविताएँ रची थी । उसने हिंदी और फारसी को मिलाकर द्विभाषी चौपाइयाँ और दोहे भी रचे थे। उसके द्वारा शुरू की गई स्वस्थ परंपरा उसके बाद सदियों तक चली थी।

वाराणसी विद्यापीठ( काशी विद्यापीठ)

सातवीं  सदी में वाराणसी भारत का प्रसिद्ध शिक्षा का केंद्र था ।उपनिषद काल में आर्य संस्कृति और धर्म का केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। काशी के राजा अज्ञातशत्रु उपनिषदकाल में एक तत्वज्ञानी और विद्या के पोषक थे।
व्यास संहिता में महर्षि वेदव्यास का आश्रय यहां लिया था।
भगवान बुद्ध ने अपने प्रचार प्रसार के लिए वाराणसी पर पसंदगी की थी।
आदि शंकराचार्य जैसे समर्थ तत्वज्ञानी ने अपने नूतन सिद्धांत की स्वीकृति के लिए काशी जाना पड़ता था।
चेतन्य महाप्रभु और पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य भी अपने वैष्णव संप्रदायों की प्रतिष्ठा यहां से प्राप्त की थी।
उन्य राजाओं के राजकुमार भी यहां उच्च शिक्षण के लिए आते थे ।
सम्राट अशोक के आश्रय से वाराणसी का सारनाथ मठ प्रसिद्ध विद्याधाम बना।

Tuesday, January 15, 2019

मुगलकालीन साथ साहित्य

अनेक मुगल शासक साहित्यकार थे प्रथम मुगल शासक बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजुके बाबरी तुर्की भाषा में लिखी थी जिसका फारसी भाषा में बाबरनामा नाम से अनुवाद किया गया।
हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम ने 'हुमायूंनामा' तथा जहांगीर ने 'जूजूके जहांगीर' अपनी आत्मकथा लिखी थी
औरंगजेब सिद्धहस्त लेखक था अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर उर्दू का प्रसिद्ध कवि था।
तुलसीदास सूरदास हिंदी के महान साहित्यकार थे । कवि केशव ने प्रेम और विरह के विषय पर साहित्य रचा था । रहीम के दोहे देश भर में आज भी प्रसिद्ध है।
फारसी भाषा में अबुल फजल ने आयने-अकबर और बाबरनामा लिखे थे। आयने-अकबरी में भारतीय रीति रिवाजों, शिष्टाचारो,धर्म-दर्शन, आर्थिक स्थिती और जीवन के लगभग सभी पक्षों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
अबुल फजल का भाई फैजी फारसी भाषा का एक महान कवि था उसने अनेक संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया था।
अकबर ने तो महाभारत, रामायण, अथर्ववेद, भागवद् गीता और पंचतंत्र जैसे अनेक ग्रंथों के अनुवाद के लिए अनेक भाषाओं के अलग विभाग बनाए थे।
मध्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना उर्दू भाषा का जन्म था। इस भाषा में वली, मीरदर्द मीरतकी मीर, नजीर , अकबराबादी, असदुल्लाखान, गालिब जैसे महान कवि थे।
18 वीं सदी की उर्दू साहित्य का विकास हुआ था । अनेक संस्कृत ग्रंथो का उर्दू में अनुवाद किया गया था। भारत में प्रथम उपन्यास उर्दू भाषा में मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने 'दरबारे अकबराबादी' की रचना की थी।

नालंदा विद्यापीठ

बिहार के पटना जिले में बड़गांव में प्राचीन नालंदा विद्यापीठ आया हुआ था।
भारतीय संस्कृति में बौद्ध और जैन परंपरा में नालंदा का महत्व अधिक है।
इस विद्यापीठ में महावीर स्वामी ने 14 चातुर्मास किया जाने से इस स्थल ने जैन तीर्थ स्थल के रुप में स्थान प्राप्त किया।
पाँचवीं सदी में कुमार गुप्त ने यहां एक बिहार बनाया था। उसके बाद नालंदा की प्रसिद्ध में वृद्धि हुई थी।
तब हस्तलिखित ग्रंथ का अमूल्य भंडार था। नालंदा विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति का एक तीर्थधाम है।
देश विदेश के विद्यार्थी यहां अध्यन करने आते थे । महान यात्री यूएन श्वांग भी यहां आया था।
नालंदा से पढ़कर बाहर निकले विद्यार्थी भारत का आदर्श विद्यार्थी माना जाता है ।ई० स० पांचवी से ग्यारहवीं सदी के दरमियान नालंदा शिक्षण का सर्वोच्च स्थान था ।
उस समय भारत में विश्वभर में श्रेष्ठतम माने जाने वाले ग्रंथालय थे। युएन-श्वाग ही657 हस्तलिखित ग्रंथ अपने साथ चीन ले गया।

महाकाव्य

भारत के दो मुख्य महाकाव्य 'रामायण' और 'महाभारत' है । ये सैंकड़ों वर्षों के दौरान रचे गए हैं ।इन महाकाव्य का वर्तमान स्वरूप तो ई०सन् की दूसरी सदी में प्राप्त हुआ। महाभारत में लगभग एक लाख का श्लोक हैं यह विश्व का सबसे बड़ा काव्य ग्रंथ है। पांडवों और कौरवों के बीच हुआ युद्ध का मुख्य विषय है । इसके उपरांत इसमें छोटी-बड़ी अनेक कहानियां जोड़ दी गई। बाद में महाभारत का एक हिस्सा 'श्रीमद् भागवत गीता' में गहन दार्शनिक सिद्धांतों का विवेचन किया गया है। इसमें मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन मार्ग बताए गए हैं ज्ञान ,कर्म और भक्ति मार्ग रामायण में अयोध्या के राजा रामचंद्र जी की कथा दी गई है। यह महाकाव्य महाभारत की अपेक्षा बहुत छोटा है इसमें कई दिलचस्प घटनाओं का वर्णन किया गया है इन दोनों महाकाव्य ने सदियों तक करोड़ों लोगों के विचारों और साहित्य सर्जन पर गहरा प्रभाव डाला है।