Monday, January 14, 2019

गुजरात की सांस्कृतिक विरासत

सांस्कृतिक पौराणिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों में लोथल, रंगपुर ,धोलावीरा, रोजड़ी और श्रीनाथगढ़ अधिक महत्वपूर्ण है।
बड़नगर की कीर्ति तोरण जूनागढ़ के सम्राट अशोक के शिलालेख , मोढेरा का सूर्य मंदिर, चंपानेर का दरवाजा, सिद्धपुर का रूद्रमहल, विरमगाँव का मुनसर तालाब, अहमदाबाद की जामा मस्जिद, झूलता मीनार, सिद्दी सैयद की जाली, हठे सिंह का देहरा, जूनागढ़ का मोहब्बतखाँ का मकबरा, नवसारी का पारसी अगियारी आदि ऐतिहासिक महत्त्व के देखने लायक स्थान है ।
धार्मिक महत्व के स्थानों में द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर और जगत गुरु शंकराचार्य की शारदा पीठ 12 ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ मंदिर, उत्तर गुजरात में अंबाजी, बहुचराजी और महाकाली माताजी पावागढ़ , मीरादातार उनाव में जैन तीर्थ पालीताना, रणछोड़रायजी मंदिर डाकोर और शामलाजी आदि तीर्थ स्थल है।
गुजरात में प्रसिद्ध धार्मिक, सामाजिक और पर्यटन स्थलों में पोलो, पतंगोत्सव और काकरिया कार्निवल , तानारी- री महोत्सव, उत्तरार्ध नृत्य महोत्सव, रणोत्सव आदि का आयोजन होता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत

भारत में जगत की विविधता पूर्ण और समृद्ध विरासत की भेंट दी है। सांस्कृतिक विरासत अर्थात् मानवसर्जित विरासत।  मानव ने अपने ज्ञान ,बुद्धि ,चातुर्य ,योग्यता और कला -कौशल्य द्वारा जो कुछ भी विकसित किया और जिसका सर्जन किया उसे साँस्कृतिक विरासत कहते हैं। आर्यों से शुरू करके कुषाण,हुण, ईरानियों, तुर्क, अरबों मुगल, पारसियों ,अंग्रेजों फ्रेंच आदि विविध जाति, प्रजातियाँ भारत में आयी। इन सभी के बीच आदान-प्रदान से भारतीय संस्कृति समृद्ध बनी है

भारत की प्राकृतिक विरासत

प्रकृति, पर्यावरण और मानवजीवन के बीच निकटता के संबंधों का परिणाम अर्थात प्राकृतिक विरासत प्राकृतिक भेट है ।भारत की प्राकृतिक विरासत विशिष्य और वैविध्यपूर्णहै। जिसमें ऊंचे पर्वत, नदियां, वृक्ष ,सागर ,लंबे समुद्री किनारों ,विशाल उपजाऊ मैदान, घाटी प्रदेश, रेगिस्तान का समावेश होता है तथा वृक्षों, जीव -जंतुओं ऋतुओं, और पशु- पक्षियों वैविध्यपूर्ण भूमि दृश्यों का समावेश होता है। हम सभी प्रकृति की संतान हैं ।प्रकृति हमारे आहार, पानी, शुद्ध वायु , निवास जैसी सभी आवश्यकताओं  को पूरी करती है।
भारतीय प्राकृतिक विरासत के चार तत्व भूमि दृश्य ,नदियां, वनस्पति ,वन्य जीवन है।

संस्कृति का अर्थ

संस्कृति अर्थात्  'जीवन जीने का तरीका' देश और समाज के कालक्रम में बदलते संजोगो के अनुसार जन जीवन में आने वाले परिवर्तनों, सुधारों ,सामाजिक रीति-रिवाजों  इन्हीं सब के माध्यम से भिन्न संजोगो लोगों में संस्कृति बनती है ।
संस्कृति अर्थात् मानव मन की उपज और उसमें मानव समाज की आदतों, मूल्यों, आचार- विचार, धार्मिक परंपराओं, आवास और जीवन के उच्च उद्देश्यों की ओर ले जाने वाले आदर्शों का योग है।

द्रविड़ संस्कृति

दृविड़ भारत के मूल नागरिक थे। उन्हें मोहें-जो-दड़ो की सिंधु संस्कृति के सर्जक और पाषाण संस्कृत के निर्माता माना जाता है।
द्रविड़ माता के रूप में देवी पार्वती और पितृ रूप में परमात्मा शिव की आराधना करते थे।
धूप दीप और आरती से पूजा की परंपरा द्रविड़ प्रज्ञा ने शुरू की थी।
द्रविड़ के मूल देवता आर्यो ने स्वीकार की थी, समय बीतने पर उत्तर के प्रचंड प्रभाव के आधीन द्रविडो़ में आर्य संस्कृति गहराई तक व्याप्त हो गई अंतरजातीय विवाह भी प्रसारित किए।
दृविड़ो में मातृ परिवार प्रथा प्रचलित थी बे अवकाशीय ग्रहों के क्षेत्र में और विविध कलाओं जैसे कताई -बुनाई ,रंगना, नाव निर्माण जैसे क्षेत्रों में उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
आज दक्षिण भारत में दृविड़ कुल की तमिल, तेलुगू ,कन्नड़ और मलयालम जैसे भाषाएँ बोलने वाले लोग बसते हैं।

Sunday, January 13, 2019

आर्य संस्कृति

भारत में आर्य सभ्यता के निर्माता आर्य (जोर्डिक) थे।
प्राचीन भारत के हिंदू आर्य कहलाते थे। वे जिन प्रदेशों में रहते थे उसे 'आर्यवर्त ' नाम दिया गया था।
प्राचीन समय में अधिक जनसंख्या वायव्य भारत में थी , वहां 7 नदियां बहती थी इसलिए उसे 'सप्त सिंधु ' नाम दिया गया।
उत्तर वैदिक काल में आज भारत के पूर्व में मिथिला विहार तक और दक्षिण में विद्यांचल तक फैले थे।
अन्य समकालीन प्रज्ञाओं में आर्य सबसे विकसित प्रज्ञा थी
आर्य भरत राजा और भरत जाति के नाम से यह विशाल प्रदेश भरतभूमि, भारत उपमहाद्वीप, भारतवर्ष जैसे नाम से पहचाना जाने लगा।
आर्य प्रकृति प्रेमी थे। बे वृक्षों ,पर्वतों, सूर्य, नदियों ,वर्षा आदि की पूजा - आराधना करते थे। जिन्होंने स्तुतियो की रचना की थी।
भारत में आई विविध पृज्ञाओं के साथ आर्यों ने मिश्रित - समन्वयी संस्कृति का निर्माण किया था।
अर्यो ने वेद पठन प्रचलित किया, धार्मिक विधियों , यज्ञादियो को शुरू किया।

हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था

कृषि एवं पशुपालन
यहां के लोग गेहूं एवं जोेै की वृहत पैमाने पर कृषि करते थे। कुछ अन्य फसले जो इस समय उगाई जाती हैं वह हैं - दाले अनाज ,कपास, खजूर ,मटर ,तरबूज एवं सरसों।
हड़प्पा के लोग अधिकतर किसान थे और यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा सभ्यता के एक कृषि वाणिज्यिक सभ्यता थी।
कालीबंगा एवं बनवाली से हल एवं कुदाल के साक्ष्य प्राप्त हुए है।
हड़प्पा सभ्यता के लोग भेड़ बकरी भैंस एवं सूअर पालते थे बे बाघ ,ऊँट ,हाथी  ,कछुआ, हिरण आदि के बारे में जानते थे परंतु शेर के बारे में नहीं जानते थे।
गैंडा यहां का प्रमुख पशु था यहां के लोग घोड़े के बारे में नहीं जानते थे।
हडप्पा के लोग कपास उत्पादन करने वाले पहले लोग  होंगे क्योंकि यहां पर कपास के सर्वप्रथम उत्पादन के साथ प्राप्त हुए हैं।

शिल्प कला
हड़प्पा सभ्यता कांस्य युग के अंतर्गत आती है क्योंकि यहां के लोग कांस्य के निर्माण एवं उपभोग से परिचित थे
यहां के लोग चित्र बर्तन विभिन्न औजार एवं शस्त्रों का निर्माण करते थे कुल्हाड़ी चाकू आरी भाले आदि।
ऊन और कपास के कपड़े बुनते थे  यहां के लोग चमड़े के बारे में भी जानते थे परंतु यहां से रेशम के कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए।
हड़प्पा के लोग मोहरे ,पत्थर की मूर्तियां, टेरा कोटा की मूर्तियां आदि बनाते थे।
मिट्टी एवं पक्की ईंटों के विशाल ढाँचो को देखकर लगता है कि ईंटो का व्यापार हड़प्पा अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था
यहां के लोग लोहे के बारे में नहीं जानते थे
यहां की मुहरों से ज्ञात होता  है कि यहां के लोग को नाव बनाना भी आता था।