Saturday, January 12, 2019

धोलावीरा

भुज से लगभग 140 किलोमीटर दूर  जिले के बड़े रेगिस्तान में खरीद भेट के ढोलावीरा गाँव से दो किमी०दूर आया हड़प्पा समकालीन बड़ा और प्राचीन नगर प्राप्त हुआ है।
गुजरात के राज पुरातत्व विभाग नेआर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों ने संशोधन किया।
कि ई०स० 1990 में रविंद्र सिंह विस्त के मार्गदर्शन के अधीन विशेष उत्खनन हुआ है।
धोलावीरा के किले, महल तथा नगर मुख्य दिवारों को सफेद  रंग किया गया होगा उसके अवशेष प्राप्त हुए हैं ।
नगर के किले बंदी की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था है। यह दीवार मिट्टी पत्थर और ईंटों की बनी है।
धोलावीरा की खोज 1922 में जे पी जोशी द्वारा गुजरात के कच्छ जिले में की गई थी।धोलावीरा में एक दरवाजे पर बड़े अक्षरों में लिखा लेख प्राप्त हुआ है रॉक कट  वास्तुकला एवं आधुनिक जल प्रबंधन व्यवस्था के  साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता कालीबंगा

कालीबंगा की खोज एक  इतालवी भारत विद् लुईगी पियो तेस्सीटोरी द्वारा सन 1953 में राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में की गई थी। यह मोहनजोदड़ो की तरह सुव्यवस्थित नहीं थी यहां जल निकासी व्यवस्था नहीं थी, परंतु कुछ अग्निकुंड एवं एक जुते हुए खेत के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता लोथल

इसकी खोज एस आर राव द्वारा 1954 में वर्तमान गुजरात के भाल क्षेत्र में की गई थी।
यहां से लाल काली मिट्टी के बरतन तांबे के औजार,ईंटो द्वारा निर्मित टैंक की संरचना, एवं  एक मोती बनाने का कारखाना एवं ईरान की मोहर प्राप्त हुई है।

सिंधु घाटी सभ्यता मोहनजोदड़ो

मोहनजोदड़ो की खोज राखल दास बनर्जी द्वारा 1922 में की गई सिंधी भाषा में मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ मृतकों के टीले है। यह सिंधु (पाकिस्तान )के लरकाना जिले में सिंधु नदी के पश्चिम में एवं सिंधु नदी एवं घग्गर हकडा़ नदी के मध्य में स्थित है
सिंधु नदी वर्तमान में भी इस थल में में बहती है परंतु घग्गर - हाकडा़ नदी सूख चुकी है।
यहां पर एक विशाल स्नानगर एवं विशाल अन्नागार, बड़े हॉल एवं कांसे की नृर्तकी की मूर्ति, योगी की मोहरें ,एवं 250 ग्राम वजन की गले का हार एवं अन्य कई मोहरें प्राप्त हुई है।
मोहनजोदड़ो शहर की सात परतें इंगित करती है कि शहर को 7 बार नष्ट किया गया एवं पुनर्निर्माण किया गया।

सिंधु घाटी सभ्यता हड़प्पा

यहां पर छह अन्नागार एवं  छह अग्निकुंड प्राप्त हुए हैं ।यहां पर व्रतनुमा ईटो से बने पंक्ति दार फर्श प्राप्त हुए हैं जो संभवत खाधान्न के गहन के काम आते थे हड़प्पा के लोग डामर बनाने की विधि से अवगत है गृह में प्रवेश के मुख्य द्वार उत्तर दिशा में होते थे यहां पर R -37 कब्रिस्थान प्राप्त हुआ है यहां पर माँ देवी की मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है।

सिंधु घाटी सभ्यता परिचय एवं प्रमुख विशेषताएं(३३००-१३०० ई०पु०)


सिंधु घाटी सभ्यता दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित एक कांस्य युगीन सभ्यता थी। प्राचीन मिस्र एवं मेसोपोटामिया को सम्मिलित करते हुए यह विश्व की तीन प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक थी दयाराम साहनी के निर्देशन में 1921 में हड़प्पा नामक स्थल पर पहली बार उत्खन्न कार्य किया गया था, अतः इसे हडप्पा सभ्यता भी कहा जाता है।
इस सभ्यता का विस्तार पश्चिम दिशा में बलूचिस्तान के सुत्कागेन्डोर,पुर्व में आलमगीरपुर(उत्तरपृदेश), दक्षिण में दायमाबाद(महाराष्ट) एवं उत्तर में मंदा (जम्बूकश्मीर) फैला हुआ है।
नगर नियोजन हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी। अत: यह सभ्यता  प्रथम शहरीकृत सभ्यता भी कहलाती है।
कस्बे दो भागों में विभक्त थे यथा दुर्ग एवं निचला कस्बा दुर्ग में शासन प्रबंध करने वाले सदस्य रहते थे जबकि कस्बे का निचला भाग जन साधारण के लिए था
धोलावीरा इसका एकमात्र अपवाद है क्योंकि यह तीन भागों में विभक्त था
कस्बे की मुख्य विशेषता उनकी जल निकासी व्यवस्था थी। नालियां पक्की हुई ईटो की बनी हुई थी एवं पत्थरों से ढकी हुई थी सफाई के लिए मेनहोल्स थे। इससे ज्ञात होता है कि हड़प्पा के लोग सफाई का विशेष तौर पर ध्यान रखते थे
इस सभ्यता के लोग नापतोल की कार्यों से परिचित थे क्योंकि यहां से कुछ लकड़ी के टुकड़े प्राप्त हुए जिन पर माप - तोल की इकाइयां अंकित थी।
मृत्यु के बाद शव को दफनाया जाता था।
बनवाली एवं कालीबंगा दो चरणों को दर्शाती है। पूर्व हड़प्पा सभ्यता एवं हड़प्पा सभ्यता।
बिना दुर्ग के एकमात्र शहर चन्हुदडाो था।

भवानी प्रसाद मिश्र का जीवन परिचय Introduction of life of Bhavani Prasad Mishra

भवानी प्रसाद मिश्र जन्म सन 1913 टिकरिया गांव जिला होशंगाबाद मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पितामह बुंदेलखंड के हमीर नामक कस्बे से  मध्य प्रदेश में आए थे। उनकी जीवका  मंदिर में पूजा करके चलती थी। उनके पांच बेटे, बेटी एक भी नहीं थी, कवि के पिता सीताराम जी सबसे छोटे भाई थे और उनके दो भाइयों में अंग्रेजी शिक्षा पाई बाकी के तीनों भाइयों को पितामह ने संस्कृत का ही अभ्यास कराया।
बचपन में भवानी प्रसाद ने अंग्रेजी स्कूल में प्रवेश लिया क्रमशः सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर में अध्ययन किया। सन् 1934 में बी.ए. पास कर लिया।
भवानी प्रसाद को हरे-भरे खुले मैदान जंगल में पहाड़ झरने और नदी इन्हीं सब से बहुत प्यार था। उन दिनों खेलों में गुल्ली डंडा में भवानी प्रसाद को बहुत दिलचस्पी थी।
भवानी प्रसाद मिश्र की राजनीति क्षेत्र में दिलचस्पी बढ़ी परंतु राजनीति के क्षेत्र में अंग्रेज सरकार से लडा़ई के दिनों तक रहा स्वतंत्रता पाने की हद तक मेरी विवशता थी। उसके बाद राजनीतिज्ञो पर निगाह जरूर  रखता था उनके काम मुझे तकलीफ देते रहे उन्हें गलत कामों में विरत भी नहीं कर पाया अनेक राजनीतिक मित्र गलत राजनीति के खिलाफ लड़ते रहे, मै उसमें भी नहीं पड़ा लेकिन लिखने के माध्यम से जो कर सकता था वही किया ।
मैंने माना कविता लिखना और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से लड़ते रहना साथ साथ नहीं चल सकता राजनीति के क्षेत्र की गांधी की राजनीति की तरह त्याग और साफ-सुथरे पन का क्षेत्र होता तो कविता भी वहां भी निखर कर सकती थी किंतु जब भारत की राजनीति संसार की तरह बनी रही तो मैं उसे अपना क्षेत्र कैसे मानता।
भवानी प्रसाद साथ में एक स्कूल चालू किया लेकिन 1942 के आंदोलन में गिरफ्तार हो गए 1945 में छोड़े गए उसी वर्ष महिला आश्रम वर्धा में शिक्षक के रूप में गए और काफी समय वर्धा में बिताए उन दिनों का आंदोलन का सिलसिला जारी था कवि लिखते हैं कि मेरा जीवन बहुत खुला खुला बीता है किसी बात की तंगी मैंने महसूस नहीं की एक छोटा सा स्कूल चला कर आजीविका प्रारंभ की और जब वही स्कूल सरकार ने छीन लिया ।
भवानी प्रसाद मिश्र की मृत्यु 20 फरवरी सन् 1985  को हुई थी।